मंगलवार, फ़रवरी 16, 2010

कैलेण्डर पर मुस्कुराती हुई लड़की

मैंने देखा उसकी आँखों में एक अजीब-सी गमक है

आधुनिक बाजार की चकाचौंध से उपजी हुई।

एक शहरी चुनौती है

जो उसकी अधखुली देह से दमक रही है

और लगभग पारदर्शी कपड़ों से

छन कर पसर रही है पूरी दीवार पर।

कैलेण्डर पर मुस्कुराती हुई लड़की

अपनी देह की सुंदरता के दर्प में नहीं मुस्कुरा रही है

और ना ही इस आशय से कि

इस तरह वह कोई यौनिक तृप्ति या सुख पा रही है।

कैलेण्डर पर मुस्कुराती हुई लड़की

के मुस्कुराहट के रहस्य

इतने सीधे-सरल भी नहीं हो सकते

या उसे इतने साधारण अर्थों में नहीं लिया जा सकता

कि-‘वह अपनी इस मुस्कुराहट की

बकायदा तय कीमत पा रही है।’

इतने फीके या स्वादहीन भी नहीं हो सकते

इस मुस्कुराहट के रहस्य

कैलेण्डर पर मुस्कुराती हुई लड़की

मुस्कुरा रही है और मुस्कराते हुए उसके होंठों पर

एक किस्म का आमंत्रण है

और यह आमंत्रण

उसकी देह में समाने का नहीं

उसकी देह पर चुपड़े ‘प्रोडक्ट’ तक जाने का है।

००

साभार - 'परिकथा' (नवलेखन अंक 2010)

शेष कविताओं के‍ लिए अंक देंखे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. कैलेण्डर पर मुस्कुराती हुई लड़की

    के मुस्कुराहट के रहस्य

    इतने सीधे-सरल भी नहीं हो सकते

    या उसे इतने साधारण अर्थों में नहीं लिया जा सकता

    कि-‘वह अपनी इस मुस्कुराहट की

    बकायदा तय कीमत पा रही है।’

    बेहतरीन पँक्तियाँ

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  2. समाज में फैली निराशा में भी बाजार ढूंढते हैं, यह दौलत के भूखे। बढ़िया कविता...

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  3. प्रदीप जी आपका ब्लॉग देखकर प्रभावित हुआ बहुत ही जानकारी भरा ब्लॉग

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